विषय-सूची (Table of Contents)

  1. प्रस्तावना
  2. अध्याय 1 — अपकृत्य: परिभाषा, तत्व एवं अपराध/संविदा से अंतर
  3. अध्याय 2 — सामान्य प्रतिरक्षा: Volenti non fit injuria
  4. अध्याय 3 — उपेक्षा (Negligence)
  5. अध्याय 4 — प्रतिनिहित दायित्व (Vicarious Liability)
  6. अध्याय 5 — कठोर दायित्व एवं आत्यंतिक दायित्व
  7. अध्याय 6 — उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 एवं त्रिस्तरीय आयोग
  8. निष्कर्ष
  9. परीक्षा-दृष्टि तालिका
  10. संदर्भ ग्रंथ सूची

1. प्रस्तावना

अपकृत्य विधि (Law of Torts) असंहिताबद्ध, न्यायाधीश-निर्मित विधि की वह शाखा है जो व्यक्ति के विधिक अधिकारों की रक्षा करती है तथा उनके उल्लंघन पर अपरिनिर्धारित नुकसानी (unliquidated damages) का उपचार देती है। इसका मूल सिद्धांत है — Ubi jus ibi remedium (जहाँ अधिकार, वहाँ उपचार)। समय के साथ इस विधि ने उपेक्षा, कठोर दायित्व एवं आत्यंतिक दायित्व जैसे सिद्धांतों का विकास किया, जिन्होंने आधुनिक औद्योगिक व उपभोक्तावादी युग की चुनौतियों का सामना किया। इसी विकास-क्रम की अगली कड़ी है उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019, जो अपकृत्य विधि के "सेवा में कमी" सिद्धांत को एक विशिष्ट, त्वरित एवं सुलभ अर्ध-न्यायिक तंत्र में रूपांतरित करता है। प्रस्तुत असाइनमेंट में इन दोनों विधाओं के केंद्रीय सिद्धांतों का निर्णीत वादों सहित विश्लेषण प्रस्तुत है।


2. अध्याय 1 — अपकृत्य: परिभाषा, तत्व एवं अपराध/संविदा से अंतर

2.1 परिभाषा

विनफील्ड के अनुसार अपकृत्यीय दायित्व उस कर्तव्य के भंग से उत्पन्न होता है जो विधि द्वारा निर्धारित है, समस्त व्यक्तियों के प्रति है, और जिसका उपचार अपरिनिर्धारित नुकसानी है। सामण्ड के अनुसार अपकृत्य वह सिविल दोष है जिसका उपचार नुकसानी है और जो संविदा-भंग या न्यास-भंग नहीं है।

2.2 आवश्यक तत्व

सदोष कार्य या लोप + विधिक क्षति (अधिकार-भंग/injuria) + विधिक उपचार (अपरिनिर्धारित नुकसानी)।

सूक्ति अर्थ केस
Injuria sine damnum क्षति नहीं परंतु अधिकार-भंग → वाद चलेगा Ashby v. White — मतदान से रोका जाना
Damnum sine injuria हानि है परंतु अधिकार-भंग नहीं → वाद नहीं चलेगा Gloucester Grammar School — प्रतिस्पर्धी स्कूल

2.3 अपकृत्य बनाम अपराध बनाम संविदा-भंग

आधार अपकृत्य अपराध संविदा-भंग
दोष की प्रकृति निजी दोष सार्वजनिक दोष संविदा-पक्षकारों के मध्य
कार्यवाही पीड़ित स्वयं सिविल वाद करता है राज्य अभियोजन चलाता है पक्षकार द्वारा
उद्देश्य क्षतिपूर्ति दण्ड नुकसानी/अनुपालन
कर्तव्य का स्रोत विधि निर्धारित करती है (in rem) विधि पक्षकार स्वयं तय करते हैं (in personam)

अपकृत्य विधि का सार है — "जहाँ अधिकार, वहाँ उपचार।" यह पीड़ित-केंद्रित, न्यायाधीश-निर्मित व निरंतर विकासशील विधि है, जैसा आगे के अध्यायों में Donoghue से उपेक्षा तथा M.C. Mehta से आत्यंतिक दायित्व के विकास से स्पष्ट होगा।


3. अध्याय 2 — सामान्य प्रतिरक्षा: Volenti non fit injuria

"जो सहमत है, उसके साथ अन्याय नहीं होता" — वादी ने जिस जोखिम को स्वेच्छा से स्वीकार किया, उससे हुई क्षति की शिकायत वह नहीं कर सकता।

3.1 लागू होने की शर्तें

सहमति स्वतंत्र हो (बल/कपट/भूल से नहीं); जोखिम का ज्ञान (knowledge) तथा स्वीकृति (assumption) दोनों आवश्यक — केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं (Smith v. Baker); कार्य विधिपूर्ण हो।

3.2 दृष्टांत-वाद

केस तथ्य परिणाम
Hall v. Brooklands Auto Racing Club (1933) कार-रेस के दर्शक; कारें टकराकर दर्शकों में गिरीं जोखिम स्वीकार था → प्रतिरक्षा सफल
Padmavati v. Dugganaika (1975) जीप में स्वेच्छा से लिफ्ट; पहिया निकलने से दुर्घटना प्रतिरक्षा सफल
Smith v. Baker (1891) मजदूर के सिर पर क्रेन से पत्थर गिरा; जोखिम का ज्ञान था ज्ञान था पर स्वीकृति नहीं → प्रतिरक्षा विफल

3.3 अपवाद

बचाव के मामले (Rescue Cases) — संकट में किसी को बचाने में लगी चोट पर प्रतिरक्षा नहीं चलती (Haynes v. Harwood — बेकाबू घोड़ों को रोकने वाला कांस्टेबल); प्रतिवादी की उपेक्षा से बढ़ा हुआ जोखिम (Slater v. Clay Cross Co.); अवैध कार्य की सहमति शून्य।

यह प्रतिरक्षा व्यक्ति की स्वायत्तता पर टिकी है, परंतु न्यायालयों ने rescue cases में इसे मानवीयता के पक्ष में सीमित किया है — जोखिम चुना जा सकता है, दूसरों की उपेक्षा नहीं।


4. अध्याय 3 — उपेक्षा (Negligence)

उपेक्षा वह स्वतंत्र अपकृत्य है जिसकी नींव Donoghue v. Stevenson (1932) ने रखी — युक्तियुक्त सावधानी के कर्तव्य का भंग जिससे दूसरे को क्षति हो। इसके तीन तत्व हैं: Duty (देखभाल का विधिक कर्तव्य — पड़ोसी-सिद्धांत), Breach (कर्तव्य का भंग — युक्तियुक्त प्रज्ञ व्यक्ति का मानक), Damage (भंग से प्रत्यक्षतः हुई क्षति — दूरवर्ती न हो)।

🔴 लीडिंग केस : डोनोघ बनाम स्टीवेन्सन (Donoghue v. Stevenson), 1932 AC 562

(2022 व 2025 में परीक्षा में आया — उपेक्षा के हर प्रश्न की नींव, आवश्यक रूप से तैयार रखें)

तथ्य: श्रीमती डोनोघ की सहेली ने कैफे में उनके लिए अदरक-बीयर की अपारदर्शी बोतल खरीदी। आधी पीने के बाद बची बीयर गिलास में डालने पर उसमें सड़ा हुआ घोंघा निकला। वे बीमार पड़ीं। बोतल स्वयं नहीं खरीदी थी — निर्माता से कोई संविदा नहीं थी।

विवाद्यक: क्या निर्माता का अंतिम उपभोक्ता के प्रति — बिना संविदा — देखभाल का कर्तव्य है?

निर्णय: हाउस ऑफ लॉर्ड्स (लॉर्ड एटकिन) ने निर्माता को उत्तरदायी ठहराया।

प्रतिपादित सिद्धांत: पड़ोसी का सिद्धांत (neighbour principle) — ऐसे कार्यों से बचना चाहिए जिनसे उन व्यक्तियों को क्षति की युक्तियुक्त पूर्वानुमेयता हो जो कार्य से प्रत्यक्षतः प्रभावित हो सकते हैं। निर्माता का अंतिम उपभोक्ता के प्रति संविदा के बिना भी कर्तव्य होता है। इस निर्णय ने उपेक्षा को एक स्वतंत्र अपकृत्य के रूप में स्थापित किया और आधुनिक उपभोक्ता संरक्षण व product liability की नींव रखी।

प्रमाण-भार एवं Res Ipsa Loquitur

सामान्यतः उपेक्षा वादी को सिद्ध करनी होती है; परंतु जहाँ दुर्घटना स्वयं उपेक्षा बोलती है — नियंत्रण प्रतिवादी का था और घटना सामान्यतः बिना उपेक्षा नहीं होती — वहाँ प्रमाण-भार प्रतिवादी पर पलट जाता है।

🔴 लीडिंग केस : दिल्ली नगर निगम बनाम सुभागवंती, AIR 1966 SC 1750

(2023 में परीक्षा में आया — Res Ipsa Loquitur का प्रमुख उदाहरण)

तथ्य: चांदनी चौक का 80 वर्ष पुराना घंटाघर गिरा, जिसमें कई लोगों की मृत्यु हुई। भवन अपनी सामान्य आयु पार कर चुका था।

निर्णय: नगर निगम उत्तरदायी ठहराया गया — सार्वजनिक मार्ग से लगे भवन के स्वामी का निरीक्षण-मरम्मत का कर्तव्य होता है।

प्रतिपादित सिद्धांत: जो दुर्घटना सामान्यतः बिना उपेक्षा नहीं होती, वहाँ Res ipsa loquitur ("तथ्य स्वयं बोलता है") लागू होता है — प्रमाण-भार प्रतिवादी पर स्थानांतरित हो जाता है।

चिकित्सकीय उपेक्षा में Bolam Test लागू होता है — चिकित्सक उत्तरदायी नहीं यदि उसने उस समय के सक्षम चिकित्सकों के स्वीकृत व्यवहार का पालन किया (Jacob Mathew v. State of Punjab, 2005 — आपराधिक दायित्व हेतु "घोर उपेक्षा" आवश्यक)।


5. अध्याय 4 — प्रतिनिहित दायित्व (Vicarious Liability)

सामान्य नियम है कि हर व्यक्ति अपने ही अपकृत्य के लिए उत्तरदायी है; परंतु प्रतिनिहित दायित्व में एक व्यक्ति दूसरे के अपकृत्य के लिए उत्तरदायी होता है — आधार सूक्तियाँ Qui facit per alium facit per se तथा Respondeat superior

5.1 स्वामी कब उत्तरदायी — दो-चरण परीक्षण

प्रश्न 1: क्या वह "सेवक" है (नियंत्रण-परीक्षण — क्या करना और कैसे करना दोनों स्वामी बताता है; स्वतंत्र ठेकेदार सेवक नहीं)? प्रश्न 2: क्या कृत्य "नियोजन के अनुक्रम में (course of employment)" हुआ — प्राधिकृत कार्य, या प्राधिकृत कार्य करने का अनधिकृत/गलत ढंग? दोनों का उत्तर हाँ हो तो स्वामी व सेवक संयुक्ततः व पृथक्तः उत्तरदायी होते हैं। कपटपूर्ण कृत्यों में भी यही सिद्धांत लागू होता है यदि कार्य नियोजन के अनुक्रम में हुआ हो (Lloyd v. Grace, Smith & Co., 1912)।

🔴 लीडिंग केस : राजस्थान राज्य बनाम विद्यावती, AIR 1962 SC 933

(2022 में परीक्षा में आया — राज्य के प्रतिनिहित दायित्व का प्रमुख वाद)

तथ्य: कलेक्टर की सरकारी जीप का चालक वर्कशॉप से जीप लाते समय लापरवाही से फुटपाथ पर चल रहे एक व्यक्ति को टक्कर मार बैठा, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।

विवाद्यक: क्या राज्य सरकारी कर्मचारी की उपेक्षा हेतु उत्तरदायी है?

निर्णय: राज्य उत्तरदायी ठहराया गया — जीप चलाना संप्रभु कार्य (sovereign function) नहीं है।

प्रतिपादित सिद्धांत: गैर-संप्रभु कार्यों में राज्य एक सामान्य स्वामी की भाँति उत्तरदायी है; लोकतांत्रिक भारत में संप्रभु उन्मुक्ति (sovereign immunity) का दायरा संकुचित होना चाहिए। (तुलना: Kasturi Lal v. State of UP, 1965 — पुलिस अभिरक्षा से सोना गबन होने पर, संप्रभु कार्य होने के कारण राज्य उत्तरदायी नहीं ठहराया गया — यह तुलना उत्तर में अवश्य लिखें।) वर्तमान न्यायिक प्रवृत्ति में संप्रभु-उन्मुक्ति निरंतर संकुचित हो रही है (N. Nagendra Rao, 1994)।

प्रतिनिहित दायित्व का आधार यह नीति है कि — "जिसकी जेब गहरी और जो जोखिम से लाभ कमाता है, वही हानि वहन करे।"


6. अध्याय 5 — कठोर दायित्व एवं आत्यंतिक दायित्व

सामान्यतः अपकृत्य में दोष (आशय या उपेक्षा) आवश्यक है, किंतु कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति बिना दोष के भी उत्तरदायी होता है — इसे कठोर दायित्व कहते हैं।

🔴 लीडिंग केस : राइलैंड्स बनाम फ्लेचर (Rylands v. Fletcher), (1868) LR 3 HL 330

(2023 में परीक्षा में आया — कठोर दायित्व का उद्गम-वाद, 2026 का सबसे बड़ा दावेदार)

तथ्य: प्रतिवादी ने ठेकेदारों से अपनी भूमि पर जलाशय बनवाया। ठेकेदारों की लापरवाही से पुरानी खदान-सुरंगें ठीक से नहीं भरी गईं। जलाशय भरते ही पानी बहकर वादी की चालू कोयला खदान में भर गया।

विवाद्यक: बिना उपेक्षा या आशय के क्या प्रतिवादी उत्तरदायी है?

निर्णय: प्रतिवादी उत्तरदायी ठहराया गया (जस्टिस ब्लैकबर्न का नियम, हाउस ऑफ लॉर्ड्स द्वारा पुष्ट)।

प्रतिपादित सिद्धांत: जो व्यक्ति अपनी भूमि पर अपने प्रयोजन से ऐसी वस्तु लाता/एकत्र करता है जो निकल भागने पर हानि करने में समर्थ है, वह उसे अपने संकट पर रखता है और निकल भागने से हुई हानि के लिए प्रथम-दृष्ट्या उत्तरदायी है। आवश्यक तत्व: (1) खतरनाक वस्तु (2) escape/निकल भागना (3) भूमि का अप्राकृतिक उपयोग। अपवाद: दैवीय कृत्य, वादी की चूक, वादी की सहमति, तृतीय पक्ष का कार्य, सांविधिक प्राधिकार।

🔴 लीडिंग केस : एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ, AIR 1987 SC 1086 (ओलियम गैस काण्ड)

(भारतीय न्यायपालिका का मौलिक योगदान — 2026 का टॉप दावेदार)

तथ्य: दिल्ली की श्रीराम फूड्स इकाई से ओलियम गैस का रिसाव (1985) हुआ, जो भोपाल गैस त्रासदी की पृष्ठभूमि में घटित एक महत्वपूर्ण घटना थी।

निर्णय एवं सिद्धांत (न्यायमूर्ति भगवती): परिसंकटमय उद्योग का समुदाय के प्रति आत्यंतिक व अप्रत्यायोज्य (absolute and non-delegable) कर्तव्य है — इसमें कोई अपवाद नहीं; escape आवश्यक नहीं (परिसर के भीतर के पीड़ित भी शामिल); क्षतिपूर्ति उद्यम की आर्थिक क्षमता के अनुपात में निर्धारित होगी (deterrent effect)। तर्क यह था कि 19वीं सदी का अंग्रेजी नियम आधुनिक औद्योगिक भारत हेतु अपर्याप्त है।

दोनों में अंतर

आधार कठोर दायित्व (1868) आत्यंतिक दायित्व (1987)
अपवाद 5 अपवाद उपलब्ध कोई अपवाद नहीं
Escape आवश्यक आवश्यक नहीं
क्षतिपूर्ति हानि के अनुपात में उद्यम की आर्थिक क्षमता के अनुपात में
दायरा अप्राकृतिक भूमि-उपयोग परिसंकटमय उद्योग

कठोर दायित्व "बिना दोष का दायित्व" है परंतु अपवादों से नरम बनाया गया है; आत्यंतिक दायित्व भारतीय न्यायपालिका का मौलिक योगदान है — पीड़ित-केंद्रित, अपवाद-रहित, औद्योगिक युग के अनुरूप।


7. अध्याय 6 — उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 एवं त्रिस्तरीय आयोग

7.1 उपभोक्ता कौन (धारा 2(7))

प्रतिफल देकर माल/सेवा खरीदने या उपयोग करने वाला व्यक्ति; E-commerce लेनदेन शामिल है; पुनर्विक्रय/वाणिज्यिक प्रयोजन बाहर रखे गए हैं (स्वरोजगार अपवाद)।

7.2 त्रिस्तरीय आयोग व्यवस्था

   राष्ट्रीय आयोग (NCDRC) ◄─ अपील ─ राज्य आयोग ◄─ अपील ─ जिला आयोग
        │                                                    ▲
        └── अपील: सुप्रीम कोर्ट (30 दिन)                शिकायत यहीं से शुरू
आधार जिला आयोग राज्य आयोग राष्ट्रीय आयोग
आर्थिक क्षेत्राधिकार (2021 नियम) ≤ 50 लाख 50 लाख से 2 करोड़ तक 2 करोड़ से ऊपर
अपील राज्य आयोग — 45 दिन राष्ट्रीय आयोग — 30 दिन सुप्रीम कोर्ट — 30 दिन

7.3 प्रक्रिया की नवीनताएँ (1986 से अंतर)

शिकायत शिकायतकर्ता के निवास/कार्यस्थल पर भी दायर हो सकती है (1986 में विक्रेता के स्थान पर जाना पड़ता था); ई-फाइलिंग की सुविधा; मध्यस्थता (Mediation, धारा 74-81) — सहमति से मामला mediation cell को भेजा जा सकता है; केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) — भ्रामक विज्ञापन व अनुचित व्यापार प्रथाओं पर कार्यवाही हेतु; उत्पाद दायित्व (Product Liability, अध्याय VI) — नया प्रावधान।

🔴 लीडिंग केस : एर्नाकुलम मेडिकल सेंटर बनाम पी.आर. जयश्री, 2020 SCC OnLine NCDRC

(2025 में परीक्षा में आया — "सेवा में कमी" की समकालीन व्याख्या)

तथ्य: शिकायतकर्ता के पिता की अस्पताल में मृत्यु हुई; शव मोर्चरी में रखा गया था। अस्पताल ने गलती से शव किसी अन्य अपरिचित परिवार को सौंप दिया, जिसने अंतिम संस्कार भी कर दिया।

विवाद्यक: क्या मृत्यु के पश्चात शव किसी गलत व्यक्ति को सौंपना "सेवा में कमी" है?

निर्णय: राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (NCDRC) ने अभिनिर्धारित किया कि रोगी की मृत्यु के बाद भी अस्पताल का कर्तव्य समाप्त नहीं होता; शव का सही उत्तराधिकारियों को सम्मानजनक हस्तांतरण भी सेवा का भाग है; गलत हस्तांतरण स्पष्ट रूप से सेवा में कमी है। (सुप्रीम कोर्ट तक ₹25 लाख की क्षतिपूर्ति की पुष्टि हुई।)

प्रतिपादित सिद्धांत: "सेवा में कमी" की परिभाषा को व्यापक रूप से व्याख्यायित किया गया — यह केवल जीवित रोगी की चिकित्सा तक सीमित नहीं, अपितु मृत्यु-पश्चात गरिमापूर्ण व्यवहार तक विस्तृत है।

2019 का ढाँचा "सस्ता, सरल, शीघ्र" न्याय के उपभोक्ता-दर्शन को साकार करता है — बढ़ी हुई आर्थिक सीमाएँ, शिकायतकर्ता-स्थान पर फाइलिंग व मध्यस्थता इसे 1986 के अधिनियम से कहीं आगे ले जाते हैं।


8. निष्कर्ष

अपकृत्य विधि, दोष-आधारित उपेक्षा से लेकर दोष-रहित कठोर एवं आत्यंतिक दायित्व तक, निरंतर पीड़ित-केंद्रित होती गई है — Donoghue से Rylands और अंततः M.C. Mehta तक का यह सफर न्यायिक रचनात्मकता का प्रमाण है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 इसी दर्शन को एक विशिष्ट, त्वरित एवं सुलभ अर्ध-न्यायिक तंत्र में परिणत करता है, जहाँ एर्नाकुलम मेडिकल सेंटर जैसे वाद "सेवा में कमी" की व्यापक व्याख्या द्वारा उपभोक्ता-हितों की रक्षा सुनिश्चित करते हैं।


9. परीक्षा-दृष्टि तालिका (Exam Relevance Table)

अध्याय संभावित अंक विगत वर्षों में आया 2026 संभावना
अपकृत्य की परिभाषा व तत्व 16 2022, 2025 उच्च
Volenti non fit injuria 16 2023, 2025 उच्च
उपेक्षा + Donoghue/Subhagwanti 16 2022, 2023 उच्च
प्रतिनिहित दायित्व + Vidyawati 16 2022, 2023 अत्यधिक (due)
कठोर/आत्यंतिक दायित्व + Rylands/M.C. Mehta 16 2022, 2023 अत्यधिक (सबसे बड़ा दावेदार)
CPA त्रिस्तरीय आयोग + Ernakulam 16 2025 उच्च